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"अगस्तिः,अगस्त्यः" ("agastiH,agastyaH")

 
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"अगस्तिः, अगस्त्यः"
पुं*
- "विन्ध्याख्यम् अगम् अस्यति अस्यति, अस्+क्तिच् शक०, या अगं विन्ध्याचलं स्त्यायति स्तभ्नाति, स्त्यै+क, या अगः कुम्भः तत्र स्त्यानः संहतः इत्यगस्त्यः"
"एक प्रसिद्ध ऋषि या मुनि का नाम। ऋग्वेद में अगस्त्य और वशिष्ठ मुनि मित्र और वरुण की सन्तान माने जाते है। कहते है कि लावण्यमयी अप्सरा उर्वशी को देखकर इनका वीर्य स्खलित हो गया। उसका कुछ भाग एक घड़े में गिर गया तथा कुछ भाग जल में। घड़े से अगस्त्य का जन्म हुआ इसीलिए इसे कुम्भ्योनि, कुम्भजन्मा, घटोद्भव, कलशयोनि आदि भी कहते हैं। वर्णन मिलता है कि इसने विन्ध्याचल पर्वत् को जो बराबर उठता जा रहा था तथा सूर्यमण्डल पर अधिकार करने ही वाला था, और जिसने इसके रास्ते को रोक दिया था, नीचे हो जाने के लिए कहा। दे०‘ विन्ध्य०( यह आख्यायिका कई विद्वानों के मतानुसार आर्य जाति की दक्षिण देश में विजय और भारत की सभ्यता के प्रति प्रगति का पूर्वाभास देती है) इसके नाम एक अन्य आख्यायिका के अनुसार समुद्र को पी जाने के कारण पीताब्धि और समुद्रचुलुक आदि भी थे, क्योकि समुद्र ने अगस्त्य को रुष्ट कर दिया था, और क्योंकि अगस्त्य युद्ध में इन्द्र और देवों की सहायता करना चाहता था जब कि देवों का युद्ध कालेय नामक राक्षवर्ग से होने लगा था और राक्ष समुद्र में जाकर छिप गये थे और तीनों लोकों को कष्ट देते थे।उसकी पत्नी का नाम लोपामुद्रा था। वह विंध्य के दक्षिण में कुंजर पर्वत पर एक तपोवन में रहता था।उसने दक्षिण में रहने वाले सभी राक्षसों को नियन्त्रण में रक्खा। एक उपाख्यान में वर्णन मिलता है कि किस प्रकार इसने वातापि नामक राक्षस को खा लिया जिसने मेंढे का रुप धारण कर लिया था, और किस प्रकार उसके भाई को जो अपने भाई का बदला लेने आया था, अपनी एक दृष्टि से भस्म कर दिया। अपने वनवास के समय घूमते हुए भगवान् राम, सीता और लक्ष्मण सहित उसके आश्रम में गये। वहाँ अगस्त्य ने इनका बहुत आदर-सत्कार किया और राम का मित्र , सलाहकार और अभिरक्षक बन गया। उसने राम को विष्णु का धनुष तथा कुछ और वस्तुएँ दीं( दे०रघु० १५/५५) ज्योतिष में इसे तारा भी माना जाता है-तु०रघु० ४/२१ भी।"